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सम्पूर्ण विश्व मे वैदिक सनातन संस्कृति के स्ट्रेन मिलते हैं ,by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब विश्व के किसी भी देश की सभ्यता को ध्यान से अवलोकित कीजिये आपको सनातनी शुभ चिन्ह अवश्य मिल जायेंगे , मेरे एक मित्र है कम्युनिस्ट है उनका काफी दिन पहले एक सवाल आया था कि भारतीय संस्कृति यदि इतनी ही उन्नत थी तो भारत के निकटवर्ती चीन में इसके चिन्ह क्यों नही मिलते ? इसपर जब मैंने जवाब दिया कि चीन में बौद्ध धर्म प्रचलित हैं जो वैदिक संस्कृति का ही अभिन्न अंग है तो उनका जवाब था कि बौद्ध दर्शन को मैं सनातन संस्कृति का हिस्सा नही मानता कुछ सनातन संस्कृति के चिन्ह है तो तर्क कीजिये ।तो उनको दिए जवाब को मैं आप सभी से साझा कर रहा हूँ , भारतीय इतिहासकार और कम्युनिस्ट शायद ही इसे जगह दे पाए कुतर्क की जगह - पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चीन में मानव बसाव लगभग साढ़े बाईस लाख (22.5 लाख) साल पुराना है। चीन की सभ्यता विश्व की पुरातनतम सभ्यताओं में से एक है। यह उन गिने-चुने सभ्यताओं में एक है जिन्होनें प्राचीन काल में अपना स्वतंत्र लेखन पद्धति का विकास किया। अन्य सभ्यताओं के नाम हैं - प्राचीन भारत (सिंधु घाटी सभ्यता), मेसोपोटामिया, मिस्र और माया। चीनी लिपि अब भी चीन, जापान के साथ-साथ आंशिक रूप से कोरिया तथा वियतनाम में प्रयुक्त होती है। इन सबमे समानता रही है कैसे उसे क्रमशः साझा करूँगा - प्रथम एकीकृत चीनी राज्य की स्थापना किन वंश द्वारा २२१ ईसा पूर्व में की गई, जब चीनी सम्राट का दरबार स्थापित किया गया और चीनी भाषा का बलपूर्वक मानकीकरण किया गया। यह साम्राज्य अधिक समय तक नहीं टिक पाया क्योंकि कानूनी नीतियों के चलते इनका व्यापक विरोध हुआ। ईसा पूर्व 220 से 206 ई. तक हान राजवंश के शासकों ने चीन पर राज किया और चीन की संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। य़ह प्रभाव अब तक विद्यमान है। हान वंश ने अपने साम्राज्य की सीमाओं को सैन्य अभियानों द्वारा आगे तक फैलाया जो वर्तमान समय के कोरिया, वियतनाम, मोंगोलिया और मध्य एशिया तक फैला था और जो मध्य एशिया में रेशम मार्ग की स्थापना में सहायक हुआ।हानों के पतन के बाद चीन में फिर से अराजकता का माहौल छा गया और अनेकीकरण के एक और युग का आरम्भ हुआ। स्वतंत्र चीनी राज्यों द्वारा इस काल में जापान से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किए गए जो चीनी लेखन कला को वहां ले गए।580 ईसवीं में सुई वंश के शाशन में चीन का एक बार फ़िर एकीकरण हुआ और खंडित चीन के उत्तरी और दक्षिणी भागों को जीतकर उसे संगठित किया। सुई व्यवस्था में अमीरों-ग़रीबों का अंतर घटने के लिए भूमि पुनर्वितरण किया गया (यानि बराबरी से बांटी गई), सरकारी मंत्रालयों का ठीक से गठन किया गया और सिक्कों का मानकीकरण किया गया (क्योंकि इस से पूर्व हर राज्य अपने सिक्के ज़र्ब कर रहा था)। सैन्य शक्ति बढ़ाई गई और उत्तर में स्थित क़बीलों से बच-बचाव के लिए चीन की महान दीवार को और विस्तृत किया गया। उसी समय बौद्ध धर्म को भी सरकारी प्रोत्साहन मिला और उसके ज़रिये चीन की भिन्न जातियों और संस्कृतियों को एक-दुसरे के समीप लाया गया। चीन की 1,776 किलोमीटर लम्बी महान नहर भी उसी समय पूरी की गई, जो ह्वांग हो (पीली नदी) को यांग्त्से नदी से जोड़ती है और आज भी विश्व की सबसे लम्बी कृत्रिम नदी या नहर है।अब आइये वैदिक संस्कृति और चीन के मध्य की कड़ी को जोड़ते हैं - जिस सुई डायनेस्टी ने चीन को एकीकृत किया उस डायनेस्टी के राजा का नाम था राजा वेन - इतिहास में उन्हें यांग जिआन के नाम से जाना जाता है उनके बचपन का नाम था - नालुओयन (naluoyan) चीन की मंदारिन से यदि इसका अनुवाद करें तो इसका अर्थ होता है #नारायण , चीन के इतिहास में इन्हें शेनवांग कहा गया है जिसका अर्थ है दैवीय राजा जो धर्मस्थलों की रक्षा करता है , आज भी इनके आकृति को दाज़हूशेंग गुफाओ (Dazhusheng Cave) में उकेरा हुआ देखा जा सकता है जो लिंगुयां मंदिर (Lingquan temple) हेनान प्रोविडेंट( Henan province) में स्थिति है ।। आज भी उनकी नारायण के रूप में पूजा की जाती है जैसे नेपाल राजवंश में नेपाल नरेश को विष्णु का अवतार माना जाता रहा है ।।#विशेष - अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीयों को चीन के विषय में ज्ञान था। महाभारत तथा मनुस्मृति में चीनी का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में चीनी सिल्क का विवरण प्राप्त होता है। सामान्यतः ऐसा माना जाता है, कि चीन देश का नामकरण वहाँ चिन वंश (121 ईसा पूर्व से 220 ईस्वी तक) की स्थापना के बाद हुआ, अतः भारत-चीन संपर्क तृतीय शताब्दी के लगभग प्रारंभ हुआ।ईसा के बहुत पहले से ही भारत तथा चीन के बीच जल एवं थल दोनों ही मार्गों से व्यापारिक संबंध थे। प्रथम शताब्दी ईस्वी के एक चीनी ग्रंथ से पता चलता है, कि चीन का हुआंग-चे (कांची) के साथ समुद्री मार्ग से व्यापार दूतमंडल चीन भेजने को कहा। इस विवरण से स्पष्ट होता है, कि ईसा पूर्व की द्वितीय अथवा प्रथम शताब्दियों में भारत तथा चीन के बीच समुद्री मार्ग द्वारा विधिवत् संपर्क स्थापित हो चुका था। मैसूर से दूसरी शती ईसा पूर्व का चीनी सिक्का मिलता है। इस प्रकार भारत और चीन के प्रारंभिक संबंध पूर्णतया व्यापारपरक थे।चीनी सिल्क की भारत में बङी माँग थी। कालिदास ने भी चीनी रेशमी वस्त्र (चीनांशुक)का उल्लेख किया है। परंतु शीघ्र ही व्यापार का स्थान धर्म प्रचार ने ग्रहण कर लिया तथा बौद्ध प्रचारकों के प्रयत्नों के फलस्वरूप भारतीय सभ्यता चीन में व्यापक रूप से फैल गयी। लेखक : वनिता कासनियां पंजाब,,

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क्या श्रीराम का पिनाक को भंग करना उचित था?माता सीता के स्वयंवर के विषय में हम सभी जानते हैं। इसी स्वयंवर में श्रीराम ने उस पिनाक को सहज ही उठा कर तोड़ डाला जिसे वहाँ उपस्थित समस्त योद्धा मिल कर हिला भी ना सके। हालाँकि कई लोग ये पूछते हैं कि श्रीराम ने धनुष उठा कर स्वयंवर की शर्त तो पूरी कर ही दी थी, फिर उस धनुष को भंग करने की क्या आवश्यकता थी?यदि आप मेरा दृष्टिकोण पूछें तो मैं यही कहूंगा कि उस धनुष की आयु उतनी ही थी। अपना औचित्य (देवी सीता हेतु श्रीराम का चुनाव) पूर्ण करने के उपरांत उस धनुष का उद्देश्य समाप्त हो गया। उसके उपरांत पिनाक का पृथ्वी पर कोई अन्य कार्य शेष नही था। कदाचित यही कारण था कि श्रीराम ने उस धनुष को भंग कर दिया।वैसे यदि आप वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस का संदर्भ लें तो दोनों में एक ही चीज लिखी है - सीता स्वयंवर के समय श्रीराम द्वारा उस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के प्रयास में वो धनुष टूट गया। अर्थात मूल रामायण के अनुसार श्रीराम ने उस धनुष को जान-बूझ कर नही तोड़ा था अपितु प्रत्यंचा चढ़ाते समय वो अनायास ही टूट गया। भगवान परशुराम के क्रोधित होने पर श्रीराम उन्हें भी यही कहते हैं कि वो धनुष उनसे अनजाने में टूट गया।हालांकि यदि आप पिनाक के इतिहास के बारे में पढ़े, जिसका वर्णन विष्णु पुराण और शिव पुराण, दोनों में विस्तार से दिया गया है, तो इस धनुष के भंग होने का वास्तविक कारण आपके समझ मे आ जाएगा। इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है जिसके अनुसार समय आने पर पिनाक को भंग होना ही था और वो भी भगवान विष्णु के द्वारा ही। इस कथा के अनुसार भगवान शंकर का धनुष पिनाक और भगवान नारायण का धनुष श्राङ्ग, दोनों का निर्माण स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने किया था। एक बार इस बात पर चर्चा हुई कि दोनों धनुषों में से श्रेष्ठ कौन है। तब ब्रह्मदेव की मध्यस्थता में भोलेनाथ और श्रीहरि में अपने-अपने धनुष से युद्ध हुआ। हर और हरि के युद्ध का परिणाम तो भला क्या निकलता किन्तु उस युद्ध में श्रीहरि की अद्भुत धनुर्विद्या देखने के लिए महादेव एक क्षण के लिए रुक गए।युद्ध के अंत में दोनों ने ब्रह्मा जी से निर्णय देने को कहा। शिवजी और विष्णुजी धनुर्विद्या में अंतर बता पाना असंभव था। किन्तु कोई निर्णय तो देना ही था इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा कि चूंकि महादेव युद्ध मे एक क्षण रुक कर नारायण का कौशल देखने लगे थे, इसी कारण श्राङ्ग पिनाक से श्रेष्ठ है। ये सुनकर महादेव बड़े रुष्ट हुए और उन्होंने उसी समय पिनाक का त्याग कर दिया। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि अब आप ही इस धनुष का नाश करें। महादेव की इच्छा का मान रखते हुए श्रीहरि ने कहा कि समय आने पर वे उस धनुष को भंग करेंगे।भगवान शंकर द्वारा त्याग दिए जाने के पश्चात वो धनुष कुछ समय तक ब्रह्मा जी के पास ही रहा। बाद में उन्होंने उसे वरुण को दे दिया। वरुण देव ने पिनाक को देवराज इंद्र को रखने को दिया। बाद में इंद्र ने उस धनुष का दायित्व मिथिला के तत्कालीन राजा देवरात को दिया। यही देवरात मिथिला नरेश जनक के पूर्वज थे। पीढ़ी दर पीढ़ी होता हुआ वो धनुष जनक को प्राप्त हुआ। पृथ्वी पर उसे "शिव धनुष" कहा गया। महर्षि वाल्मीकि ने मूल रामायण में इसे शिव धनुष ही कहा है जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसे पिनाक कहा है।एक अन्य कथा के अनुसार जब नारायण और महादेव युद्ध के लिए तत्पर हुए तो उस समय एक आकाशवाणी हुई कि ये युद्ध संसार के कल्याण के लिए संकट है जिससे संसार का नाश हो जाएगा। इस पर श्रीहरि तो पहले की भांति धनुषबद्ध रहे किन्तु भगवान रूद्र ने आकाशवाणी सुन कर उसे पृथ्वी पर फेंक दिया। बाद में वही धनुष जनक के पूर्वज देवरात को प्राप्त हुआ।कहते हैं कि एक बार माता सीता ने केवल ७ वर्ष की आयु में उस धनुष को उठा लाया था जिसे कोई हिला भी नही पाता था। तब राजा जनक ने ये प्रण किया कि वो उसी से सीता का विवाह करेंगे जो इस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा। उधर भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित हो चुके थे। सीता स्वयंवर में श्रीराम रूपी नारायण ने महादेव की इच्छा को फलीभूत करने के लिए ही अंततः उस धनुष को भंग कर दिया। अर्थात वो महान धनुष महादेव की इच्छा से ही भंग हुआ, सीता स्वयंवर तो केवल निमित्त मात्र था।वास्तव में ये घटना सृष्टि के उस नियम को भी प्रतिपादित करती है जिसके अनुसार सृष्टि में कुछ भी अनश्वर नही है, चाहे वो मनुष्य हो अथवा वस्तु। समय पूर्ण होने पर सबका नाश होना अवश्यम्भावी है, यही सृष्टि का अटल नियम है। जय श्री हरिहर।

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पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या ‘राधा’ का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है। By वनिता कासनियां पंजाब मान्यता  कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है।श्री भागवत पुराण आरती आरती अतिपावन पुरान की । धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥ महापुराण भागवत निर्मल । शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥ परमानन्द सुधा-रसमय कल । लीला-रति-रस रसनिधान की ॥ ॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥ कलिमथ-मथनि...

*#हिंदू धर्म की विशेष परंपराओं को तो विज्ञान भी करता है प्रणाम by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~हमारे देश में जितनी विविधता देखने को मिलती है उतनी ही विशेष है यहां की अलग-अलग संस्कृति और परंपराएं. जी हां, हिंदू धर्म में कई ऐसी परंपराएं है जिनका पालन सदियों से होता आ रहा है।हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करते हुए आज भी लोग अपने से बड़ों के पैर छूते हैं और शादीशुदा महिलाएं आज भी अपने मांग में सिंदूर जरूर लगाती हैं. इन परंपराओं के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी है।1- पैर छूनाहिंदू धर्म की परंपराओं में अपने से बड़ों के पैर छूना भी शामिल है. आज के इस आधुनिक युग में भी अधिकांश लोग अपने से बड़ों से मिलने पर उनके चरण स्पर्श करते हैं. इस परंपरा को विज्ञान भी सलाम करता है क्योंकि चरण स्पर्श करने से दिमाग से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है।2- नमस्ते या प्रणाम करनाजब भी हम किसी से मिलते हैं अपने हाथ जोड़कर उसे नमस्ते/प्रणाम अवश्य करते हैं. प्रणाम करने के लिए जब हम हाथ जोड़ते हैं तो हमारी उंगलियां एक-दूसरे को स्पर्श करती हैं जिससे पैदा होने वाले एक्यूप्रेशर से हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।इसके अलावा हाथ मिलाने की जगह नमस्ते करने से हम सामने वाले व्यक्ति के संपर्क में नहीं आते हैं, जिसके कारण से उसके हाथों के बैक्टीरिया हमारे संपर्क में नहीं आते हैं. अब तो महामारी के बुरे समय के बाद प्रणाम या नमस्ते करने का प्रचलन विदेशों में भी होता जा रहा है, यही हमारी संस्कृति की अमूल्य पहचान और परिचय है !3- मांग भरनाशादीशुदा महिलाएं अपने मांग में सिंदूर भरती हैं और इस परंपरा के पीछे भी वैज्ञानिक तर्क छुपा हुआ है. बताया जाता है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है जो शरीर के ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है. सिंदूर महिलाओं में यौन उत्तेजना बढ़ाता है जिसके चलते विधवा औरतों के सिंदूर लगाने पर निषेध होता है।4- तिलक लगानाकिसी भी मांगलिक कार्य के समय महिलाएं और पुरुष अपने माथे पर तिलक लगाते हैं. इसके पीछे वैज्ञानिक मान्यता है कि कुमकुम या तिलक लगाने से हमारी आंखों के बीच माथे तक जाने वाली नस में ऊर्जा बनी रहती है. तिलक लगाने से चेहरे की कोशिकाओं में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।5- जमीन पर बैठकर खानाआज भी अधिकांश घरों में लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं. जमीन पर पालथी मारकर बैठने को एक योग आसन माना गया है। इस आसन में बैठकर खाने से दिमाग शांत रहता है और पाचन क्रिया ठीक होती है।6- कान छिदवानाकान छिदवाना भारतीय परंपराओं में शामिल है. सदियो पुरानी इस परंपरा के पीछे जो तर्क बताया गया है उसके अनुसार कर्ण (कान) छिदवाने से इंसान की सोचने की शक्ति बढ़ती है. वैज्ञानिक तर्क के अनुसार कान छिदवाने से बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जानेवाली नस में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।7- सिर पर चोटीहिंदू धर्म में आज भी अधिकांश ब्राह्मण अपने सिर पर शिखा रखते हैं. इस शिखा के बारे में कहा जाता है कि सिर पर जिस जगह पर चोटी रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं. जो एकाग्रता बढ़ाने, गुस्से को कंट्रोल करने और सोचने की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती हैं।8- उपवास रखनाहिंदू धर्म में उपवास रखने की परंपरा बहुत पुरानी है. आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है. एक रिसर्च के अनुसार व्रत रखने से कैंसर का खतरा भी कम होता है. इसके साथ ही दिल की बीमारियां और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है।9- तुलसी की पूजाआज भी अधिकांश घरों में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी पूजा की जाती है. वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी का पौधा इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जिसका प्रयोग कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है।10- मूर्ति की पूजाहिंदू धर्म में लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मूर्ति पूजा करते हैं. मूर्ति पूजा के पीछे छुपे वैज्ञानिक तर्क के अनुसार मूर्ति दिमाग को एक जगह पर स्थिर रखने में सहायता करती है।हिंदू धर्म में इन परंपराओं को काफी महत्व दिया गया है जिसका लोग सदियों से पालन करते आ रहे हैं और विज्ञान भी इन परंपराओं के आगे नतमस्तक है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~*,* # Science also praises the special traditions of Hinduism by social worker Vanita Kasani Punjab ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ~ The diversity seen in our country is as special as it is here.