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NewsPointRecord WhatsApp Call With This Easy Way, Learn This Process Quickly…By Vnita Kasnia Punjab imageEver since we entered the digital world, people have started giving priority to phones. Ever since WhatsApp came in the phone, till date it has become the number 1 app for sending messages. With this WhatsApp app, you can make both audio and video calls rather than cover text. But there are many times when you are talking to someone on WhatsApp audio era and the person in front told something important but you are not mindful after which you regret that you wish you could record that thing.imageCall record on whatsappBut now it is also possible to do so. Yes, certain devices are required to record WhatsApp calls to Android and iPhone. It is unethical and illegal to record calls without the permission of another person. In such a situation, you must inform the other person about the call recording. Let us tell you how a call can be recorded on WhatsApp.This is how iPhone users record callsIf you are iPhone use then you have to connect iPhone to MaC with the help of Lightning cable. After this, by clicking Trust this computer on your iPhone, you will see this click. For the first time, open QuickTime connecting Mac to iPhone phone and it will get the option of New audio recording in the File section. In it you will see an arrow sign pointing to the underside of the record button. Which you have to click on and choose iPhone.Record the number by selecting it imageAfter doing this process, click the record button in Quicktime and call from your WhatsApp. As soon as you are connected, add the user icon. Choose the number of the person you want to talk to. Your call will start being recorded as soon as the call is received. Don’t forget to close the record after the call ends, save the file in Mac.Android users record such callsDownload Android User Cube Call Recorder. After opening the app go to WhatsApp. Whoever you want to talk to. If the cube call widget is visible data during the call, then the call is being recorded. Once the error shows, you open the Cube Call Recorder once again. This time you have to go to the settings of the app and click on Force Voip in a voice call. After this whole process, you put a WhatsApp call once again. If the cube call recorder is not showing, it means that it will not work in your phone.,

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क्या श्रीराम का पिनाक को भंग करना उचित था?माता सीता के स्वयंवर के विषय में हम सभी जानते हैं। इसी स्वयंवर में श्रीराम ने उस पिनाक को सहज ही उठा कर तोड़ डाला जिसे वहाँ उपस्थित समस्त योद्धा मिल कर हिला भी ना सके। हालाँकि कई लोग ये पूछते हैं कि श्रीराम ने धनुष उठा कर स्वयंवर की शर्त तो पूरी कर ही दी थी, फिर उस धनुष को भंग करने की क्या आवश्यकता थी?यदि आप मेरा दृष्टिकोण पूछें तो मैं यही कहूंगा कि उस धनुष की आयु उतनी ही थी। अपना औचित्य (देवी सीता हेतु श्रीराम का चुनाव) पूर्ण करने के उपरांत उस धनुष का उद्देश्य समाप्त हो गया। उसके उपरांत पिनाक का पृथ्वी पर कोई अन्य कार्य शेष नही था। कदाचित यही कारण था कि श्रीराम ने उस धनुष को भंग कर दिया।वैसे यदि आप वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस का संदर्भ लें तो दोनों में एक ही चीज लिखी है - सीता स्वयंवर के समय श्रीराम द्वारा उस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के प्रयास में वो धनुष टूट गया। अर्थात मूल रामायण के अनुसार श्रीराम ने उस धनुष को जान-बूझ कर नही तोड़ा था अपितु प्रत्यंचा चढ़ाते समय वो अनायास ही टूट गया। भगवान परशुराम के क्रोधित होने पर श्रीराम उन्हें भी यही कहते हैं कि वो धनुष उनसे अनजाने में टूट गया।हालांकि यदि आप पिनाक के इतिहास के बारे में पढ़े, जिसका वर्णन विष्णु पुराण और शिव पुराण, दोनों में विस्तार से दिया गया है, तो इस धनुष के भंग होने का वास्तविक कारण आपके समझ मे आ जाएगा। इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है जिसके अनुसार समय आने पर पिनाक को भंग होना ही था और वो भी भगवान विष्णु के द्वारा ही। इस कथा के अनुसार भगवान शंकर का धनुष पिनाक और भगवान नारायण का धनुष श्राङ्ग, दोनों का निर्माण स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने किया था। एक बार इस बात पर चर्चा हुई कि दोनों धनुषों में से श्रेष्ठ कौन है। तब ब्रह्मदेव की मध्यस्थता में भोलेनाथ और श्रीहरि में अपने-अपने धनुष से युद्ध हुआ। हर और हरि के युद्ध का परिणाम तो भला क्या निकलता किन्तु उस युद्ध में श्रीहरि की अद्भुत धनुर्विद्या देखने के लिए महादेव एक क्षण के लिए रुक गए।युद्ध के अंत में दोनों ने ब्रह्मा जी से निर्णय देने को कहा। शिवजी और विष्णुजी धनुर्विद्या में अंतर बता पाना असंभव था। किन्तु कोई निर्णय तो देना ही था इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा कि चूंकि महादेव युद्ध मे एक क्षण रुक कर नारायण का कौशल देखने लगे थे, इसी कारण श्राङ्ग पिनाक से श्रेष्ठ है। ये सुनकर महादेव बड़े रुष्ट हुए और उन्होंने उसी समय पिनाक का त्याग कर दिया। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि अब आप ही इस धनुष का नाश करें। महादेव की इच्छा का मान रखते हुए श्रीहरि ने कहा कि समय आने पर वे उस धनुष को भंग करेंगे।भगवान शंकर द्वारा त्याग दिए जाने के पश्चात वो धनुष कुछ समय तक ब्रह्मा जी के पास ही रहा। बाद में उन्होंने उसे वरुण को दे दिया। वरुण देव ने पिनाक को देवराज इंद्र को रखने को दिया। बाद में इंद्र ने उस धनुष का दायित्व मिथिला के तत्कालीन राजा देवरात को दिया। यही देवरात मिथिला नरेश जनक के पूर्वज थे। पीढ़ी दर पीढ़ी होता हुआ वो धनुष जनक को प्राप्त हुआ। पृथ्वी पर उसे "शिव धनुष" कहा गया। महर्षि वाल्मीकि ने मूल रामायण में इसे शिव धनुष ही कहा है जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसे पिनाक कहा है।एक अन्य कथा के अनुसार जब नारायण और महादेव युद्ध के लिए तत्पर हुए तो उस समय एक आकाशवाणी हुई कि ये युद्ध संसार के कल्याण के लिए संकट है जिससे संसार का नाश हो जाएगा। इस पर श्रीहरि तो पहले की भांति धनुषबद्ध रहे किन्तु भगवान रूद्र ने आकाशवाणी सुन कर उसे पृथ्वी पर फेंक दिया। बाद में वही धनुष जनक के पूर्वज देवरात को प्राप्त हुआ।कहते हैं कि एक बार माता सीता ने केवल ७ वर्ष की आयु में उस धनुष को उठा लाया था जिसे कोई हिला भी नही पाता था। तब राजा जनक ने ये प्रण किया कि वो उसी से सीता का विवाह करेंगे जो इस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा। उधर भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित हो चुके थे। सीता स्वयंवर में श्रीराम रूपी नारायण ने महादेव की इच्छा को फलीभूत करने के लिए ही अंततः उस धनुष को भंग कर दिया। अर्थात वो महान धनुष महादेव की इच्छा से ही भंग हुआ, सीता स्वयंवर तो केवल निमित्त मात्र था।वास्तव में ये घटना सृष्टि के उस नियम को भी प्रतिपादित करती है जिसके अनुसार सृष्टि में कुछ भी अनश्वर नही है, चाहे वो मनुष्य हो अथवा वस्तु। समय पूर्ण होने पर सबका नाश होना अवश्यम्भावी है, यही सृष्टि का अटल नियम है। जय श्री हरिहर।

अशोक सुंदरी By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्रों श्री कार्तिकेय एवं श्रीगणेश के विषय में तो हम सभी जानते हैं किन्तु उनकी कन्या "अशोकसुन्दरी" के विषय में सबको अधिक जानकारी नहीं है। हालांकि महादेव की और भी पुत्रियां मानी गयी हैं, विशेषकर जिन्हें नागकन्या माना गया - जया, विषहरी, शामिलबारी, देव और दोतलि। किन्तु अशोक सुंदरी को ही महादेव की की पुत्री बताया गया है इसीलिए वही गणेशजी एवं कार्तिकेय की बहन मानी जाती है। कई जगह पर इन्हे गणेश की छोटी बहन भी बताया गया है लेकिन अधिकतर स्थानों पर ये मान्यता है कि ये गणेश की बड़ी बहन थी। पद्मपुराण अनुसार अशोक सुंदरी देवकन्या हैं।  इनकी उत्पत्ति के विषय में एक कथा है कि देवी पार्वती ने उन्हें कल्पवृक्ष से प्राप्त किया था। एक बार देवी पार्वती को उदास देख कर महादेव ने उनका मन बहलाने के लिए उन्हें स्वर्गलोक के नंदनवन ले गए। वहाँ कल्पवृक्ष को देख कर माता को अत्यधिक हर्ष हुआ और वे उनके नीचे ही बैठ गयी। उस समय देवराज इंद्र ने माता की बड़ी सेवा की जिससे वे अत्यंत प्रसन्न हुई। उसी वृक्ष के नीचे बै...

पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या ‘राधा’ का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है।By वनिता कासनियां पंजाबमान्यता कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है।श्री भागवत पुराण आरतीआरती अतिपावन पुरान की ।धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥महापुराण भागवत निर्मल ।शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥परमानन्द सुधा-रसमय कल ।लीला-रति-रस रसनिधान की ॥॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥कलिमथ-मथनि त्रिताप-निवारिणि ।जन्म-मृत्यु भव-भयहारिणी ॥सेवत सतत सकल सुखकारिणि ।सुमहौषधि हरि-चरित गान की ॥॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥सृष्टि-उत्पत्ति के सन्दर्भ में इस पुराण में कहा गया है- एकोऽहम्बहुस्यामि। अर्थात् एक से बहुत होने की इच्छा के फलस्वरूप भगवान स्वयं अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार कर लेते हैं। तब काल से तीनों गुणों- सत्व, रज और तम में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा स्वभाव उस क्षोभ को रूपान्तरित कर देता है।तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियाँ और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं। इन सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है। यह ब्रह्माण्ड रूपी अण्डां एक हज़ार वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसमें से सहस्त्र मुख और अंगों वाले विराट पुरुष को प्रकट किया। उस विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।विषय-विलास-विमोह विनाशिनि ।विमल-विराग-विवेक विकासिनि ॥भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।परम ज्योति परमात्मज्ञान की ॥॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।रसिक-हृदय-रस-रासविलासिनि ॥भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम सुदासिनि ।कथा अकिंचन प्रिय सुजान की ॥॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥जब मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर का पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्र की प्राप्ति होती है ।श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - श्रीमद भागवतमहापुराण के प्रति आकर्षण मन में हुआ तो यह मानना चाहिए कि यह पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों का प्रभाव है । इसका मतलब यह है कि एक जन्मों के पुण्यों के बल पर श्रीमद भागवत जी प्राप्त नहीं कर सकते । इस तथ्य से यह पता चलता है कि यह कितना विलक्षण, कितना दुर्लभ, भगवत सिद्धान्तों का अंतिम निष्कर्ष, प्रभु की प्रसन्नता का प्रधान कारण, भक्ति के प्रवाह को बढ़ाने वाला यह श्रीग्रंथ है ।

पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या ‘राधा’ का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है। By वनिता कासनियां पंजाब मान्यता  कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है।श्री भागवत पुराण आरती आरती अतिपावन पुरान की । धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥ महापुराण भागवत निर्मल । शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥ परमानन्द सुधा-रसमय कल । लीला-रति-रस रसनिधान की ॥ ॥ आरती अतिपावन पुरान की… ॥ कलिमथ-मथनि...

*#हिंदू धर्म की विशेष परंपराओं को तो विज्ञान भी करता है प्रणाम by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~हमारे देश में जितनी विविधता देखने को मिलती है उतनी ही विशेष है यहां की अलग-अलग संस्कृति और परंपराएं. जी हां, हिंदू धर्म में कई ऐसी परंपराएं है जिनका पालन सदियों से होता आ रहा है।हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करते हुए आज भी लोग अपने से बड़ों के पैर छूते हैं और शादीशुदा महिलाएं आज भी अपने मांग में सिंदूर जरूर लगाती हैं. इन परंपराओं के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी है।1- पैर छूनाहिंदू धर्म की परंपराओं में अपने से बड़ों के पैर छूना भी शामिल है. आज के इस आधुनिक युग में भी अधिकांश लोग अपने से बड़ों से मिलने पर उनके चरण स्पर्श करते हैं. इस परंपरा को विज्ञान भी सलाम करता है क्योंकि चरण स्पर्श करने से दिमाग से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है।2- नमस्ते या प्रणाम करनाजब भी हम किसी से मिलते हैं अपने हाथ जोड़कर उसे नमस्ते/प्रणाम अवश्य करते हैं. प्रणाम करने के लिए जब हम हाथ जोड़ते हैं तो हमारी उंगलियां एक-दूसरे को स्पर्श करती हैं जिससे पैदा होने वाले एक्यूप्रेशर से हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।इसके अलावा हाथ मिलाने की जगह नमस्ते करने से हम सामने वाले व्यक्ति के संपर्क में नहीं आते हैं, जिसके कारण से उसके हाथों के बैक्टीरिया हमारे संपर्क में नहीं आते हैं. अब तो महामारी के बुरे समय के बाद प्रणाम या नमस्ते करने का प्रचलन विदेशों में भी होता जा रहा है, यही हमारी संस्कृति की अमूल्य पहचान और परिचय है !3- मांग भरनाशादीशुदा महिलाएं अपने मांग में सिंदूर भरती हैं और इस परंपरा के पीछे भी वैज्ञानिक तर्क छुपा हुआ है. बताया जाता है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है जो शरीर के ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है. सिंदूर महिलाओं में यौन उत्तेजना बढ़ाता है जिसके चलते विधवा औरतों के सिंदूर लगाने पर निषेध होता है।4- तिलक लगानाकिसी भी मांगलिक कार्य के समय महिलाएं और पुरुष अपने माथे पर तिलक लगाते हैं. इसके पीछे वैज्ञानिक मान्यता है कि कुमकुम या तिलक लगाने से हमारी आंखों के बीच माथे तक जाने वाली नस में ऊर्जा बनी रहती है. तिलक लगाने से चेहरे की कोशिकाओं में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।5- जमीन पर बैठकर खानाआज भी अधिकांश घरों में लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं. जमीन पर पालथी मारकर बैठने को एक योग आसन माना गया है। इस आसन में बैठकर खाने से दिमाग शांत रहता है और पाचन क्रिया ठीक होती है।6- कान छिदवानाकान छिदवाना भारतीय परंपराओं में शामिल है. सदियो पुरानी इस परंपरा के पीछे जो तर्क बताया गया है उसके अनुसार कर्ण (कान) छिदवाने से इंसान की सोचने की शक्ति बढ़ती है. वैज्ञानिक तर्क के अनुसार कान छिदवाने से बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जानेवाली नस में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।7- सिर पर चोटीहिंदू धर्म में आज भी अधिकांश ब्राह्मण अपने सिर पर शिखा रखते हैं. इस शिखा के बारे में कहा जाता है कि सिर पर जिस जगह पर चोटी रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं. जो एकाग्रता बढ़ाने, गुस्से को कंट्रोल करने और सोचने की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती हैं।8- उपवास रखनाहिंदू धर्म में उपवास रखने की परंपरा बहुत पुरानी है. आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है. एक रिसर्च के अनुसार व्रत रखने से कैंसर का खतरा भी कम होता है. इसके साथ ही दिल की बीमारियां और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है।9- तुलसी की पूजाआज भी अधिकांश घरों में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी पूजा की जाती है. वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी का पौधा इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जिसका प्रयोग कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है।10- मूर्ति की पूजाहिंदू धर्म में लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मूर्ति पूजा करते हैं. मूर्ति पूजा के पीछे छुपे वैज्ञानिक तर्क के अनुसार मूर्ति दिमाग को एक जगह पर स्थिर रखने में सहायता करती है।हिंदू धर्म में इन परंपराओं को काफी महत्व दिया गया है जिसका लोग सदियों से पालन करते आ रहे हैं और विज्ञान भी इन परंपराओं के आगे नतमस्तक है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~*,* # Science also praises the special traditions of Hinduism by social worker Vanita Kasani Punjab ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ~ The diversity seen in our country is as special as it is here.