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श्री राधा🌺🙌🏻by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब🌺किस किस ने रस कथा सुननी हैबहुत बहुत बहुत छोटी ☺ सीराधा रानी को देखो स्वयं पूछ रही हैकिशोरी जू खुद बुला रही हैआ गयी किशोरी जी सब आ गयी हैस्वामिनी जी हम सब आपके लिए एक सुंदर से कथा सुनाने को सोच रही थीअब हम कथा करते है स्वामीनी आ चुकी हैएक बार सब मंजरियाँ जहाँ कोई भी कुंज में हो हाथ उठा राधारानी का स्वागत करेबोलो राधा रानी की जय बोलो बरसाने वारी की जय🌺🙌🏻🌺🙌🏻🌺🙌🏻🌺चलो सब अपना अपना आसन ग्रहण करोऔर सब कथा सुनोचलो सबपूछोगे नहि कहाँजी कहाँ आज हम सब line बना कर श्यमाश्याम के साथ माधवीकुंज जा रहे हैश्री युगल आज माधवीकुंज में प्रस्थान कर रहे है श्री ललिता जी आगे आगे विशाखा स्वामिनी के संग पीछे गुणमंजरी रति मंजरी पंक्ति बना कर और श्यामसुंदर अपना एक हाथ प्रियाजी के गले में और दूसरा अपनी मुरली बजाते हुए पशु पक्षी को मुरलीधुन सुनाते जा रहे हैकभी शुक उड़ कर स्वामिनी के बाँह पर बैठ जाता है तो कभी सारिका उड़ कर स्वामिनीके कंधे पर स्वामिनी सबको अपने वात्सल्य रस से पीठ पर हाथ फेरी जा रही है तभी यह ख़बर भँवरे भी पा लेते है के आनंद की रसमूर्ति युगल आ रहे है वो भी झुंड बना वहीं आ रहे होते हैस्वामिनी अपना वात्सल्य रस दे शुक सारिका को दे श्याम को आग्रह करती है के " आ आप इन्हें अपना प्रेम रस दो तब श्याम शुकों को सारिका के मुख पर अपनी मुरली रख देते है और उनकी पीठ पर हाथ फेर कहते है " बजाओ मुरली तुम सब मुझसे अछी बजा सकते हो क्यूँकि अभी अभी तुमने स्वामिनी का वात्सल्य रस प्राप्त किया है वो गुरु है हम सबकी यह सुन स्वामिनी अपने मुख में शर्मा के साड़ी का छोर दबा लेती हैपीछे से भँवरो के अगाध झुंड को देख कस्तूरी मंजरी सब भँवरो को स्वामिनी के पास ना आने का निर्देश देती है श्याम सुंदर प्रियाजी के ओर निहारते है तब स्वामिनी का मुख नीचे हो जाता है तभी ललिता जी कहती है प्रिया प्रियतम माधवी कुंज आ गयाप्रिया प्रियतम वहाँ बने मोर की आकृति के आसन पर विराजते है और सखियाँ मंजरिया अपने अपने कार्यों में लग जाती है कोई युगल के लिए फल काटती है कोई शरबत बनाती है कोई मेवा की मिठाई तो कोई गुलाब की सेवातभी स्वामिनी सिंहासन पर बैठी प्रियतम को देखती है अपनी परम रस मय नेत्रोसे निहारते हुए एक पद गाती है मन में परंतु वो भाव मधुमती जान कर उसे गा देती है वो यह भाव है सुनिएतभी मधुमती श्री राधा के भावो को श्याम को सुनाती है अपनी वीना में क्यूँकि स्वामिनी शर्माती है नामैं सुनाता हूँफिर भेजूँगापड़ लो गीतपड़ लो तब आगे चलेंगे🌹मेरे तुम मैं नित्य तुम्हारी , तुम मैं , मैं तुम , संग - असंग |पता नही कबसे मैं तुम बन, तुम मैं बने कर रहे रंग ||🌹तभी मधुमती श्री राधा के भाव को गा देती है जिसे सुनकर श्याम प्रेम रस में निमज्जित हो जाते है और वो मधुमती को देख कर कुछ प्रिया जी के लिए अपना भाव प्रकट करना चाहते हैअब सुनो प्रियतम का क्या गीत है स्वामिनी के लिए परंतु मधुमती से गवाते हैतू तो मेरे प्राणन गू ते प्यारी |नेु चितै हणस बोलिये मोसौं हौं तो शरण तिहारी ||अन्तर दूर करौ अचरा कौखौल दै घूँघट पट सारी |कृष्णदास प्रभु गिरिधर नागर भर लीने अैंकवारी ||पड़ लीजिएअब इस कथा का सबसे ऊँचा रस प्रकट होगा सबसे ऊँचा उच्चतमसब ध्यान से सुनना सब रस में खो जाओगेअब युगल दोनो भावों में प्रेम निमज्जित हो अपनी आँखें चढ़ा लेते है जैसे नशे में हो और राधारानी को प्रीतम के प्रेम का नशा इतना चड़ता है के अपनी दोनो कमल नयन चढ़ा वो विशाखा के ओर देखती हैतभी वो क्या देखती है के श्री विशाखा का भाव जिसे " स्वाधीनभरतिका" कहते है जिसमें श्री कृष्ण उस भाव में आधीन रहते है तभी स्वामिनी जब विशाखा को देखती है तभी वो विशाखा का स्वभाव धारण कर लेती है और विशाखा के भाव से " श्याम के गले में हाथ डाल देती है और उनसे नृत्य करने को कहती है स्वाधीनभारतीका भाव से भावित विशाखा जब राधा स्वयं विशाखा बनती है तब प्रियतम उसके वश हो नृत्य करते हैअब श्री राधा विशाखा के भाव में श्याम के संग नृत्य करती है और अपनी चुनरी बार बार गिराती है और श्याम उन्हें उठाते हैतभी नृत्य करते करते विशाखासखी के भाव में वो श्याम के बाँह पकड़ गोल धारा बना नाचने को कहती है श्याम तभी गोल धारा बना नाचते है तभी श्री राधा विशाखा के भाव में कहती है" तुम्हारा मिलन ही मेरा आनंद है विरह वियोग तो हममें होता ही नहींअभी अब श्री राधा के नैन श्री ललिता पर जाते है श्री ललिता के परम उत्कृष्ट श्री कृष्ण भाव से अब वो भावित हो जाती है ललिता का भाव है " विशुद्ध खंडिता" भाव जिसका अर्थ " क्रोध" होता है तभी श्री राधा उस भाव में भावित हो ललिता बन जाती हैअब वो रानी, श्री ललिता भाव में खंडिता भाव में क्रोध में होती है तब श्याम उनसे अनुनय विनय करते है " हे ललिता ( राधा ललिता भाव में) तू मुझे प्राण से प्यारी है मेरा विलम्ब आने में इसलिए हुई है मैं तेरे लिए पुष्प की माला बना रहा थातभी रानी ललिता भाव में चतुराई से पूछती है प्रियतम से "आपके सर पर यह सिंदूर कैसा"????" आपका नेत्र लाल क्यूँ है " आप आज बात करते करते रुक क्यूँ रहे हो??अब सुनो प्रियतम क्या कहते हैप्रियतम की चतुराई देखो श्री राधा से ललिताभाव में 1. मेरे सर पर यह सिंदूर इसलिए है क्यूँकि मैंने गणेश पूजन किया तब जब मैंने माथा टेका तब वो सिंदूर लग गया माथे में मेरे लाल नेत्र इसलिए है " आज सुबह मैंने सूर्य को एकटकि लगाकर देखा तब से मेरा नेत्र लाल हो गया है मैं बात करते इसलिए रुक रहा हूँ क्यूँकिमुझे डर है कोई यहाँ आ ना जाए और हमें देख लेतभी मंजरी कहती है कन्हैया कोई कितने भी " सिलाई कर ले क्या कभी कोई आसमान को सील सकता है " बनाओ बहाने कब तक बनाओगेतभी रानी ललिता भाव में उनकी दृष्टि " चित्रा जी " पर पड़ती है तभी चित्रा के भाव जो कृष्ण का है वो ग्रहण कर लेती है " दीवाभिसारिका" अब रानी चित्रा भाव में चित्रा बन जाती हैअब रानी, चित्रा भाव में आ जाती दिवभिसारिका में उसका अर्थ है " चित्रा अपने को सज़ा कर श्री कृष्ण का इंतज़ार करती है और उनके पद में पुष्प बिछाती है " तभी रानी उसी चित्रा भाव में आकर अपने को सजाती सँवारती है और प्रियतम के चरणो में फूल बरसाती हैहैतभी रानी चित्राभाव में प्रियतम को अपनी बाँह में ले बहुत रोती है और कहती है अब तुम कहीं नहि जाओगे तभी रानी का दृष्टि चित्रा भाव से चंपकलता को देखती है देखते ही अब रानी चम्पकलता भाव में आ जाती हैअब प्रियाजी चम्पकलाता भाव में " शैया सजाती है " पुष्पों से अपने हाथो से सजाती है तभी सब वृक्ष लता पता धीरे धीरे चल मानो चँवर चला रहे हैतभी मयूर, मयूरी को देख रानी चंपकलता भाव में उन्हें पकड़ लेती है और उन्हें अपने गोद में बैठा लेती है और उन्हें कृष्ण कृष्ण बोलने को कहती हैअब रानी चम्पकलाता भाव में प्रियतम के साथ आलिंगन करती है तभी उनकी दृष्टि पड़ती है इन्दुलेखा सखी " का भाव रानी को आ जाता है अब रानी इन्दुलेखा के भाव में आ जाती है इन्दुलेखा का भाव " सुदूरव्रती" है जिसका अर्थ है जिनके प्रियतम प्रदेश चले गए और वो उन्हें याद करती है अब रानी इन्दुलेखा के भाव में प्रियतम को याद करती है के कब आयोगे प्रियतम हैरानी अब इन्दुलेखा भाव में विरहनी की तरह रोती है और नृत्य करती है और यह गान करती हैसुनोगी कौन सा गान रानी इन्दुलेखा भाव में गाती हैअब रानी विरही में नृत्य करते करते श्री रंगदेवी को देखती है तभी रानी रंगदेवी के भाव को धारण कर लेती है हैतभी रानी उस रंगदेवी भाव में अति विरही हो जाती है तभी रानी रंगदेवी भाव में अपने हाथो को अपने कपोलों पर रख अश्रु बहाकर जब अति विरह को धारण कर जब पुष्प शैया पर बैठती है तब पुष्प मुरझा नहीं बल्कि पूरे सुख जाते है तभी रानी रंगदेवी भाव में रोतीं है और उनकी नासिका से धूम विरहअग्नि निकलती है तभी ललिता तुंगविध्या को भेजती है तभी तुंगविध्या रानी को छूती है छूते ही रानी रंगदेवी भाव को छोड़ कर तुंगविद्या भाव में आ जाती हैतभी रानी तुंगविध्या भाव में गायन करती हैअब रानी तुंगविद्या भाव में जब सुदेवी को देखती है तभी सुदेवी भाव में आती है सुदेवी का भाव " कलहांतरिका" अर्थात प्रियतम से प्रेम झगड़ा करती है अगर वो ग़लती करते है अब रानी सुदेवी भाव में प्रियतम से लड़ती है कहाँ चले गए थे अब आए हो तुम कभी मेरा ख़याल करते हो रानी को क्रोध कभी नहि आता यह श्याम जानते है परंतु अब रानी सुदेवी भाव में क्रोध करती है जानते हो कौन सा भाव गाती है क्रोध मेंपूछो कौन सा ??कौन सा जीतुम मेरी मोतिन लर क्यों तोरी ।रहो ढोटा तुम नन्द महर के,नित्य करत बरजोरी ।। अबहि नई पहरी हो आई, चुडिया तुम सब होरी ।जब देए हो लकुट बांसुरी, बिनी रतन करोड़ी ।।हमहुँ बड़े मेहर की बेटी, तुम कारे हम गोरी ।"परमानन्द" मुस्कावत राधा, पूर्ण चंद्र चकोरी ।।ये जो अभी गाया यहाँ श्री राधारानी को आठों सखीयो का भाव आया और इन सब भावो से कृष्ण प्रकट कियाकृष्ण प्रेम से प्रकट होता हैआप सब ने जो कथा सुनी मंजरियों आप पर आठ सखीयो की कृपा भी होगीजय हो श्री राधा रानी जी की 🌺🙌🏻🌺एक बार हम एक साथ आठ सखीयो का नाम लिखते है🌹श्री ललिता जी🌹विशाखा जी🌹तुंगविद्या जी🌹 सुदेवी जी🌹रंगदेवी जी🌹 श्री चित्रा जी 🌹श्री चम्पकलता जी🌹 श्री इन्दुलेखा जी🙏राधे राधे सब मंजरियो🙏श्री राधा🙇🏼👣🌹,

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क्या श्रीराम का पिनाक को भंग करना उचित था?माता सीता के स्वयंवर के विषय में हम सभी जानते हैं। इसी स्वयंवर में श्रीराम ने उस पिनाक को सहज ही उठा कर तोड़ डाला जिसे वहाँ उपस्थित समस्त योद्धा मिल कर हिला भी ना सके। हालाँकि कई लोग ये पूछते हैं कि श्रीराम ने धनुष उठा कर स्वयंवर की शर्त तो पूरी कर ही दी थी, फिर उस धनुष को भंग करने की क्या आवश्यकता थी?यदि आप मेरा दृष्टिकोण पूछें तो मैं यही कहूंगा कि उस धनुष की आयु उतनी ही थी। अपना औचित्य (देवी सीता हेतु श्रीराम का चुनाव) पूर्ण करने के उपरांत उस धनुष का उद्देश्य समाप्त हो गया। उसके उपरांत पिनाक का पृथ्वी पर कोई अन्य कार्य शेष नही था। कदाचित यही कारण था कि श्रीराम ने उस धनुष को भंग कर दिया।वैसे यदि आप वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस का संदर्भ लें तो दोनों में एक ही चीज लिखी है - सीता स्वयंवर के समय श्रीराम द्वारा उस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के प्रयास में वो धनुष टूट गया। अर्थात मूल रामायण के अनुसार श्रीराम ने उस धनुष को जान-बूझ कर नही तोड़ा था अपितु प्रत्यंचा चढ़ाते समय वो अनायास ही टूट गया। भगवान परशुराम के क्रोधित होने पर श्रीराम उन्हें भी यही कहते हैं कि वो धनुष उनसे अनजाने में टूट गया।हालांकि यदि आप पिनाक के इतिहास के बारे में पढ़े, जिसका वर्णन विष्णु पुराण और शिव पुराण, दोनों में विस्तार से दिया गया है, तो इस धनुष के भंग होने का वास्तविक कारण आपके समझ मे आ जाएगा। इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है जिसके अनुसार समय आने पर पिनाक को भंग होना ही था और वो भी भगवान विष्णु के द्वारा ही। इस कथा के अनुसार भगवान शंकर का धनुष पिनाक और भगवान नारायण का धनुष श्राङ्ग, दोनों का निर्माण स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने किया था। एक बार इस बात पर चर्चा हुई कि दोनों धनुषों में से श्रेष्ठ कौन है। तब ब्रह्मदेव की मध्यस्थता में भोलेनाथ और श्रीहरि में अपने-अपने धनुष से युद्ध हुआ। हर और हरि के युद्ध का परिणाम तो भला क्या निकलता किन्तु उस युद्ध में श्रीहरि की अद्भुत धनुर्विद्या देखने के लिए महादेव एक क्षण के लिए रुक गए।युद्ध के अंत में दोनों ने ब्रह्मा जी से निर्णय देने को कहा। शिवजी और विष्णुजी धनुर्विद्या में अंतर बता पाना असंभव था। किन्तु कोई निर्णय तो देना ही था इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा कि चूंकि महादेव युद्ध मे एक क्षण रुक कर नारायण का कौशल देखने लगे थे, इसी कारण श्राङ्ग पिनाक से श्रेष्ठ है। ये सुनकर महादेव बड़े रुष्ट हुए और उन्होंने उसी समय पिनाक का त्याग कर दिया। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि अब आप ही इस धनुष का नाश करें। महादेव की इच्छा का मान रखते हुए श्रीहरि ने कहा कि समय आने पर वे उस धनुष को भंग करेंगे।भगवान शंकर द्वारा त्याग दिए जाने के पश्चात वो धनुष कुछ समय तक ब्रह्मा जी के पास ही रहा। बाद में उन्होंने उसे वरुण को दे दिया। वरुण देव ने पिनाक को देवराज इंद्र को रखने को दिया। बाद में इंद्र ने उस धनुष का दायित्व मिथिला के तत्कालीन राजा देवरात को दिया। यही देवरात मिथिला नरेश जनक के पूर्वज थे। पीढ़ी दर पीढ़ी होता हुआ वो धनुष जनक को प्राप्त हुआ। पृथ्वी पर उसे "शिव धनुष" कहा गया। महर्षि वाल्मीकि ने मूल रामायण में इसे शिव धनुष ही कहा है जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसे पिनाक कहा है।एक अन्य कथा के अनुसार जब नारायण और महादेव युद्ध के लिए तत्पर हुए तो उस समय एक आकाशवाणी हुई कि ये युद्ध संसार के कल्याण के लिए संकट है जिससे संसार का नाश हो जाएगा। इस पर श्रीहरि तो पहले की भांति धनुषबद्ध रहे किन्तु भगवान रूद्र ने आकाशवाणी सुन कर उसे पृथ्वी पर फेंक दिया। बाद में वही धनुष जनक के पूर्वज देवरात को प्राप्त हुआ।कहते हैं कि एक बार माता सीता ने केवल ७ वर्ष की आयु में उस धनुष को उठा लाया था जिसे कोई हिला भी नही पाता था। तब राजा जनक ने ये प्रण किया कि वो उसी से सीता का विवाह करेंगे जो इस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा। उधर भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित हो चुके थे। सीता स्वयंवर में श्रीराम रूपी नारायण ने महादेव की इच्छा को फलीभूत करने के लिए ही अंततः उस धनुष को भंग कर दिया। अर्थात वो महान धनुष महादेव की इच्छा से ही भंग हुआ, सीता स्वयंवर तो केवल निमित्त मात्र था।वास्तव में ये घटना सृष्टि के उस नियम को भी प्रतिपादित करती है जिसके अनुसार सृष्टि में कुछ भी अनश्वर नही है, चाहे वो मनुष्य हो अथवा वस्तु। समय पूर्ण होने पर सबका नाश होना अवश्यम्भावी है, यही सृष्टि का अटल नियम है। जय श्री हरिहर।

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